Phy – 7_1

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एक प्रत्यावर्ती विधुत धारा का समीकरण I = 0.6 sin 100πt से निरूपित है। विधुत धारा की आवृत्ति है –

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प्रत्यावर्ती धारा का ऊष्मीय प्रभाव प्रमुखतः है –

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संधारित्र का शक्ति गुणांक लगभग है-

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अपचायी ट्रान्सफॉर्मर बढ़ाता है –

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LCR परिपथ में धारिकत्व को C से बदलकर 4C कर दिया जाता है। समान अनुनादी आवृत्ति के लिए प्रेरकत्व को L से बदलकर होना चाहिए।

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यदि LCR परिपथ में L= 8.0 हेनरी, C = 0.5 μ, R = 100 Ω श्रेणीक्रम में हैं, तो अनुनादी आवृत्ति होगी-

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A.C. का समीकरण i = 50 sin100t है तो धारा की आवृत्ति होगी-

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एक उच्चायी परिमापित्र में कण्डलियों में फेरों की संख्या में प्रथांमक में N1 तथा द्वितीयक में N2 तक-

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किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा एवं विभवान्तर के बीच कलान्तर θ है। तब शक्ति गुणांक होगा-

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प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में यदि धारा I एवं वोल्टेज के बीच कलान्तर हो तो धारा का वाटहीन घटक होगा :

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प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के LCR श्रेणी संयोजन में वोल्टेज प्रत्येक L,C,R घटक में 50 वोल्ट है। वोल्टेज LC संयोजन के बीच होगा-

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प्रतिबाधा (Impedance) का S.I. मात्रक होता है?

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चोक कुण्डली का कार्य सिद्धान्त निम्न पर आधारित है –

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भारत में आपूर्ति की जा रही प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति है –

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L-C परिपथ को कहा जाता है?

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तप्त-तार आमीटर मापता है, प्रत्यावर्ती धारा का –

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निम्नलिखित में से किसके लिए संधारित्र अनंत प्रतिरोध की तरह कार्य करता है?

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किसी LCR परिपथ में ऊर्जा का क्षय होता है?

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प्रतिघात का मात्रक होता है –

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प्रत्यावर्ती धारा का ऊष्मीय प्रभाव प्रमुखत है –

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